पाठ-5 नागरी लिपि ( गोधूलि भाग-2 गध खंड ) Subjective Question 2023

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पाठ-5 नागरी लिपि ( गोधूलि भाग-2 गध खंड ) Subjective Question 2023

Short Type Questions

1. गुर्जर प्रतिहार कौन थे?

उत्तर-गुर्जर प्रतिहार भारत के बाहर से आकर आठवीं सदी के आरंभ में अवंती प्रदेश में अपना शासन स्थापित किया। बाद में इन्होंने कन्नौज पर कब्जा कर लिया। 

2. लेखक ने किन भारतीय लिपियों से देवनागरी का संबंध बताया है?

उत्तर-लेखक ने गुजराती, मराठी, नेपाली और बंगला आदि भारतीय लिपियों से देवनागरी लिपि का संबंध बताया है।

3. देवनागरी में कौन-सी भाषाएँ लिखी जाती हैं?

उत्तर-देवनागरी में संस्कृत, प्राकृत, खड़ी बोली की भाषाएँ लिखी जाती हैं। इनके अलावा हिन्दी की विविध बोलियाँ तथा नेपाली और नेवारी भाषा देवनागरी में लिखी जाती हैं। 

4. ब्राह्मी और सिद्धम लिपि की तुलना में नागरी लिपि की मुख्य पहचान क्या है?

उत्तर- गुप्तकाल की ब्राह्मी तथा बाद की सिद्धम लिपि के अक्षरों के सिरों पर छोटी आड़ी लकीरें या छोटे तिकोन हैं लेकिन नागरी लिपि की मुख्य पहचान यह है कि अक्षरों के सिरों पर पूरी लकीरें बन जाती हैं और ये शिरोरेखाएँ उतनी ही लम्बी रहती हैं जितनी कि अक्षरों की चौड़ाई होती है। मोटे तौर दोनों की यही पहचान है। 

5. नागरी लिपि कब तक एक सार्वदेशिक लिपि थी? BM

उत्तर_नागरी लिपि का सार्वदेशिक लिपि इसलिए कहा जा सकता है कि इसका प्रचलन करीब 8वीं सदी से 12वीं सदी तक पूरे देश में फैल चुका था। | कोकण, देवगिरि, चोड राजाओं केरल, श्रीलंका, लाहौर, उत्तर भारत में मेवाड, गुहिल, सांभर-अजमेर, कन्नौज, काठियावाड़ा, आबू और त्रिपुरा आदि क्षेत्रों तक इसका प्रचलन था। 

6. देवनागरी लिपि के अक्षरों में स्थिरता कैसे आई है?

उत्तर-देवनागरी लिपि के टाइप बन जाने पर इसके अक्षरों में स्थिरता आई। 

7. देवनागरी लिपि के अक्षरों में स्थिरता कैसे आई? BM, 15A

उत्तर-लगभग दो सौ वर्ष पहले छापाखाने के लिए देवनागरी लिपि बनी तब से अनेक पुस्तकें छपनी शुरू हो गयी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय विभिन्न साहित्यिक और विद्वानों ने इस लिपि में सुधार कर प्रेस तथा कंप्यूटर के लायक बनाया। इससे इसमें स्थिरता आ गई। 

8. लेखक ने पटना से नागरी का क्या संबंध बताया है? 18A

उत्तर-'पादताडितकम' नामक नाटक से जानकारी मिलती है कि पाटलिपुत्र (पटना) को नगर कहते थे। अतः 'नागर' या 'नागरी' शब्द उत्तर भारत के किसी बडे नगर से संबंध रखता है। लेखक ने कहा है कि हो सकता है यह । बड़ा नगर प्राचीन पटना ही हो।

Long Type Answer

1. नागरी को देवनागरी क्यों कहते हैं? लेखक इस संबंध में क्या बताता है?
या, नागरी की उत्पत्ति के संबंध में लेखक का क्या कहना है? पटना से नागरी का क्या संबंध है?

उत्तर-नागरी नाम के संबंध में अनेक मत हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि गुजरात के नागर ब्राह्मणों ने सबसे पहले इस लिपि का प्रयोग किया, इसलिए इसका नाम नागरी पड़ा। 

कुछ विद्वानों का मत है कि और सब तो नगर हैं लेकिन काशी 'देवनागरी' है, अतः वहाँ प्रयुक्त होने के कारण इसे। 'देवनागरी' कहते हैं। ‘पादताडितकम' के अनुसार पाटलिपुत्र को नगर कहते थे। 

चंद्रगुप्त (द्वितीय) 'विक्रमादित्य' का व्यक्तिगत नाम 'देव' था। इसलिए पाटलिपुत्र को 'देवनगर' कहते थे। यह भी संभव है कि उत्तर भारत की प्रमुख लिपि होने के कारण इसे 'देवनागरी' कहा गया है। 

2. 'नागरी लिपि' पाठ का सारांश लिखें।
अथवा, देवनागरी लिपि में कौन-कौन सी भाषाएँ लिखी जाती हैं?

उत्तर-हिन्दी तथा इसकी विविध बोलियाँ देवनागरी लिपि में लिखी जाती हैं। नेपाली, जेवारी और मराठी की लिपि भी नागरी है। संस्कृत और प्राकृत की पुस्तक भी देवनागरी में ही प्राकशित होती है।
 
गुजराती लिपि भी देवनागरी से बहुत भिन्न नहीं। बंगला लिपि भी प्राचीन नागरी लिपि की बहन ही है। सच तो यह है कि दक्षिण भारत की अनेक लिपियाँ नागरी की भाँति । ही प्राचीन ब्राह्मी से विकसित हैं।

बारहवीं सदी के श्रीलंका के शासकों के सिक्के पर भी नागरी अक्षर . ङ्के मिलते हैं महमूद गजनवी, मुहम्मद गोरी, अलाउदीन खिलजी, शेरशाह ने भी अपने नाम नागरी में खुदवाए हैं और अकबर के सिक्के में भी 'रामसीय' शब्द अंकित है। वस्तुतः ईसा की आठवीं-नौवीं सदी से नागरी लिपि का प्रचलन सारे देश में था।

नागरी नाम को लेकर तरह-तरह के विचार हैं। किन्तु इतना निश्चित है कि 'नागरी' शब्द किसी बड़े नगर से संबंधित है। काशी को देवनगर कहते थे, हो सकता है, वहाँ प्रयुक्त लिपि का नाम 'देवनागरी' पड़ा हो। 

वैसे, गुप्तों की राजधानी पटना भी 'देवनगर' थी इसके नाम पर यह नामकरण हो सकता है। जो भी हो, यह नगर-विशेष की लिपि नहीं थी। आठवीं-ग्यारहवीं सदी में यह सार्वदेशिक लिपि थी। 

नागरी लिपि के साथ अनेक प्रादेशिक भाषाएँ जन्म लेती हैं, यथा, मराठी, बंगला आदि। नागरी लिपि के लेख न केवल पश्चिम तथा पूर्व बल्कि सूदूर दक्षिण से भी मिले हैं।

3. 'नागरी लिपि' पाठ का सारांश लिखें।

प्रस्तुत शीर्षक 'नागरी लिपि' गुणकर मुले द्वारा रचित है। इसमें लेखक ने देवनागरी लिपि की उत्पत्ति, विकास और प्रचलन पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। लेखक का कहना है कि यह पुस्तक जिस लिपि में छपी है उसे नागरी या देवनागरी लिपि कहते हैं। इस प्रकार की लिपि लगभग 250 वर्ष पूर्व बनाई गई थी। इसके विकास से पत्रों में स्थिरता आई।

इस लिपि में हिंदी और इसकी विभिन्न बोलियाँ, संस्कृत और नेपाली आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं। देवनागरी के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि संसार में संस्कृत और प्राकृत की पुस्तकें अधिकांशतः इसी लिपि में छपती हैं।

देश में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं और बोलियों को भी इस लिपि में लिखा जाता है। तमिल, मलयालम, तेलुगु और कन्नड़ की लिपियों में भिन्नताएँ दिखाई देती हैं, लेकिन ये लिपियाँ भी नागरी जैसी प्राचीन ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई हैं।

लेखक का कहना है कि नागरी लिपि के प्राचीनतम लेख हमें दक्षिण भारत से ही प्राप्त हुए हैं। इस लिपि को नंदीनगरी लिपि कहा गया। तमिल-मलयालम और तेलुगु-कन्नड़ लिपियाँ दक्षिण भारत में स्वतंत्र रूप से विकसित हो रही हैं, फिर भी अनेक शासकों ने नागरी लिपि का प्रयोग किया है।

उदाहरण के लिए, ग्यारहवीं शताब्दी में राजराजा और राजेंद्र जैसे प्रतापी चोल राजाओं के सिक्कों पर नागरी अक्षर और बारहवीं शताब्दी में केरल के शासकों के सिक्कों पर "विरा केरलस्य" अंकित हैं।

इसी प्रकार वर्गुना की 9वीं शताब्दी की पलियम ताम्रपत्र नागरी लिपि में है, जबकि 11वीं शताब्दी में इस्लामी शासन की नींव रखने वाले महमूद गजनवी के चांदी के सिक्कों पर भी नागरी लिपि के शब्द मिलते हैं।

गजनवी के बाद मुहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी, शेरशाह आदि शासकों ने भी अपने सिक्कों पर नागरी शब्द खुदवाए। अकबर के सिक्कों पर नागरी लिपि में 'रमसिया' शब्द अंकित है। तात्पर्य यह है कि नागरी लिपि का प्रचलन ईसा की आठवीं-नौवीं शताब्दी में प्रारम्भ हुआ।

लेखक ने लिपि की पहचान में कहा है कि ब्राह्मी और सिद्धम लिपि के अक्षर त्रिकोणीय हैं जबकि नागरी लिपि के अक्षरों के सिरों पर रेखा की लंबाई और चौड़ाई समान है।

 प्राचीन नागरी लिपि के अक्षर आधुनिक नागरी लिपि के समान हैं। इस प्रकार नागरी लिपि की रचनाएँ दक्षिण भारत में 8वीं शताब्दी से तथा उत्तर भारत में 9वीं शताब्दी से मिलने लगती हैं।

अब प्रश्न उठता है कि इस नई लिपि को नागरी, देवनागरी और नन्दीनगरी क्यों कहा जाता है। नागरी शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों का मत एक समान नहीं है।

कुछ विद्वानों का मत है कि इस लिपि का प्रयोग सर्वप्रथम गुजरात के नगर ब्राह्मणों ने किया था, इसलिए इसका नाम नागरी पड़ा, परन्तु कुछ विद्वानों के मतानुसार अन्य नगर नगरी मात्र हैं, किन्तु काशी को देवनागरी माना जाता है, इसलिए इसका नाम नागरी पड़ा। देवनागरी पढ़ी गई।

अलबरूनी के अनुसार नागरी शब्द लगभग 1000 ई. में अस्तित्व में आया। यह निश्चित है कि नागरी शब्द का संबंध किसी कस्बे या कस्बे से है। दूसरे, उत्तर भारत की स्थापत्य कला की विशेष शैली को 'नगर शैली' कहा जाता था।

इस नगर या नगरी का संबंध उत्तर भारत के किसी बड़े नगर से था। उस समय प्राचीन पटना उत्तर भारत का सबसे बड़ा नगर था। साथ ही गुप्त शासक चन्द्रगुप्त (द्वितीय) का व्यक्तिगत नाम 'विक्रमादित्य' 'देव' था, संभव है कि गुप्तों की राजधानी पटना को 'देवनागरा' कहा जाता था और देवनागरी की लिपि के कारण इसे देवनागरी नाम दिया गया था।

अन्ततः लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि यह लिपि 8वीं से 11वीं शताब्दी ईस्वी तक सार्वभौम हो चुकी थी, अतः इसके नामकरण के सम्बन्ध में कुछ भी कहना संभव नहीं लगता।

मिहिर भोज की ग्वालियर प्रशस्ति नागरी लिपि में है। धारा नगरी के परमार शासक भोज अपनी शिक्षा के लिए प्रसिद्ध हैं। 12वीं शताब्दी के बाद, भारत के सभी हिंदू शासकों और कुछ इस्लामी शासकों ने अपने सिक्कों पर नागरी लिपि का प्रयोग किया।

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