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परंपरा का मूल्यांकन | Hindi Important Subjective Questions

परंपरा का मूल्यांकन | Hindi Important Subjective Questions
परंपरा का मूल्यांकन | Hindi Important Subjective Questions


परंपरा का मूल्यांकन | Hindi Important Subjective Questions

Parampara ka mulyankan important subjective question answer परंपरा का मूल्यांकन क्या है निबंध या कहानी? परंपरा का मूल्यांकन साहित्य की कौन सी विद्या है? परंपरा का ज्ञान किन के लिए सबसे अधिक आवश्यक है और क्यों? निबंध का समापन करते हुए लेखक कैसा स्वप्न देखता है उसे साकार करने में परंपरा की क्या भूमिका हो सकती है विचार करें? parampara ka mulyankan important subjective question answer. परंपरा का मूल्यांकन | Hindi Important Subjective Questions

परंपरा का मूल्यांकन 


1. ‘परम्परा का मूल्यांकन' पाठ का सारांश लिखिए। साहित्य और समाज में युग-परिवर्तन के लिए साहित्य की परम्परा का ज्ञान और विवेक दृष्टि आवश्यक है। कैसे? स्पष्ट कीजिए। 
उत्तर:- जो लोग साहित्य में युग-परिवर्तन चाहते हैं, रूढ़ियाँ तोड़कर त्य-रचना करना चाहते हैं, उनके लिए साहित्य की परम्परा का ज्ञान है। 

साहित्य की परम्परा का मूल्यांकन करते हुए सबसे पहले उस साहित्य का मूल्य निर्धारित किया जाता है जो जनहित को प्रतिबिम्बित करता की नकल करके लिखा जानेवाला साहित्य अधम कोटि का होता है। महान् नाकार किसी का अनुसरण नहीं करते, पूर्ववर्ती कवियों की रचनाओं का मनन कर, स्वयं सीखते और नयी परम्पराओं को जन्म देते हैं। उनकी आवृत्ति नहीं होती। शेक्सपियर के नाटक दुबारा नहीं लिखे गए।

साहित्य के निर्माण में प्रतिभाशाली मनुष्यों की भूमिका निर्णायक होती है। किन्तु सब श्रेष्ठतम हो यह जरूरी नहीं है। पूर्णतः निर्दोष होना भी कला का दोष है। यही कारण है कि अद्वितीय उपलब्धियों के बाद भी कुछ नये की संभावना बनी रहती है। यही कारण है कि राजनीतिक मूल्यों की अपेक्षा साहित्यिक मूल्य अधिक स्थायी हैं।

साहित्य के विकास में जन-समुदायों और जातियों की विशेष भूमिका होती है। यूरोप के सांस्कृतिक विकास में यूनानियों की भूमिका कौन नहीं जानता? दरअसल, इतिहास का प्रवाह विच्छिन्न है और अविच्छिन्न भी। मानव समाज बदलता और अपनी पुरानी अस्मिता कायम रखता है। इस अस्मिता का ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। 

जिस समय राष्ट्र पर मुसीबत आती है, यह अस्मिता प्रकट हो जाती है। यह प्रेरक शक्ति का काम करती है। हिटलर के आक्रमण के समय रूस में इसी अस्मिता ने काम किया। इसी प्रकार, भारत में राष्ट्रीयता राजनीति की नहीं, इसके इतिहास और संस्कृति की देन है और इसका श्रेय व्यास और वाल्मीकि को है। 

कोई भी देश, बहुजातीय राष्ट्र के रूप में भारत का मुकाबला नहीं कर सकता। साहित्य की परम्परा का पूर्ण ज्ञान समाजवादी व्यवस्था में ही संभव है। समाजवादी संस्कृति पुरानी संस्कृति को आत्मसात कर आगे बढ़ती है। 

हमारे देश की जनता जब साक्षर हो जाएगी तो व्यास और वाल्मीकि के करोड़ों पाठक होंगे। सुब्रह्मण्यम भारती और रवीन्द्रनाथ ठाकुर को सारी जनता पढ़ेगी। तब मानव संस्कृति में भारतीय साहित्य का गौरवशाली नवीन योगदान होगा। 

2. बहुजातीय राष्ट्र की हैसियत से कोई भी देश भारत का मुकाबला क्यों नहीं कर सकता? 17A
उत्तर भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहाँ बहुत सारी जातियाँ बसती हैं। सबकी अपनी भाषा है. रीति-रिवाज हैं लेकिन सबका इतिहास एक है और संस्कृति एक है। राष्ट्र के गठन में इतिहास और संस्कृति की बड़ी भूमिका जाता है। 

यहाँ की राष्टीयता किसी एक जाति की दूसरी पर विजय से निर्मित नहा है। इसके पीछे इतिहास और संस्कृति की अविच्छिन्न धारा है। संस्कृति क निर्माण में यहाँ के कवियों का अमल्य योगदान है। 

रामायण और महाभारत । कथाएँ सम्पूर्ण देश में पढ़ी-सुनी जाती हैं, मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर सब गाँव-शहर में मिलते हैं। इस प्रकार, बहुजातीय राष्ट्र की से कोई भी देश भारत का मुकाबला नहीं कर सकता है। 

3.विभाजित बंगाल से विभाजित पंजाब की तुलना कीजिए, तो ज्ञात हो जाएगा कि साहित्य की परम्परा का ज्ञान कहाँ ज्यादा है, कहाँ कम है और इस न्यूनाधिक ज्ञान के सामाजिक परिणाम क्या होते हैं सप्रसंग व्याख्या करें।
उत्तर-प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक 'गोधूलि' भाग-2 में संकलित आलोचक रामविलास शर्मा के निबंध 'परम्परा का मूल्यांकन' से उद्धृत है। साहित्य की परम्परा के मूल्यांकन और महत्त्व को इस पंक्ति के माध्यम से बताया गया है। लेखक कहता है कि जहाँ के लोगों में साहित्य की परम्परा का ज्ञान होता है, वहाँ के लोग जुदा होकर भी भावनात्मक दृष्टि से एक होते हैं। 

इस संदर्भ में वह बंगाल के लोगों का उदाहरण देता है। अविभाजित बंगाल में साहित्य परम्परा का ज्ञान था। विभाजित होने पर भी बंगाल और बंगला देश भाषायी और सांस्कृतिक दृष्टि से एक हैं जबकि अविभाजित पंजाब में ऐसा कुछ नहीं है। पाकिस्तान के पंजाब और हिन्दुस्तान के पंजाब में पर्याप्त अन्तर है। 

4. साहित्य में विकास प्रक्रिया उसी तरह संपन्न नहीं होती, जैसे समाज में सप्रसंग व्याख्या करें।
उत्तर-'परम्परा का मूल्यांकन' शीर्षक निबंध की प्रस्तुत पंक्ति द्वारा रामविलास शर्मा यह बताना चाहते हैं कि साहित्य और समाज का अभिन्न नाता है, किन्तु समाज और साहित्य का विकास समान रूप से नहीं होता। 

समाज के विकास में अर्थ की भूमिका अधिक होती है, कल-कारखानों के विकास से समाज विकसित होता है, परन्तु साहित्य के लिए हृदय की समृद्धि जरूरी होती है-प्राणिमात्र के लिए सद्भावना प्रेम और सहानुभूति। 

5. परंपरा का मूल्यांकन निबंध का समापन करते हुए लेखक कैसा स्वप्न देखता है? उसे साकार करने में परंपरा की क्या भूमिका हो सकती है? विचार करें।
उत्तर-परंपरा का मूल्यांकन' शीर्षक निबंध में लेखक यह बताता है कि जब इस देश में समाजवादी व्यवस्था कायम हो जाएगी, तब हमारी जनता को अपने साहित्य की परंपरा का पूर्ण ज्ञान हो सकेगा। अभी हम निर्धन और निरक्षर हैं। हमारी जनता साहित्य की महान उपलब्धियों के ज्ञान से वंचित है। बाल्मीकि और व्यास के करोड़ों पाठक बन जाएँगे। 

भारत में सांस्कृतिक आदान-प्रदान होने लगेगा। विभिन्न भाषाओं में लिखा हुआ साहित्य जातीय सीमाएँ लाँघकर सम्पूर्ण देश की संपत्ति बनेगा। अंग्रेजी ज्ञानार्जन की भाषा बन जायेगी। 

मानव संस्कृति की विशद् धारा में भारतीय साहित्य की गौरवशाली परंपरा का नवीन योगदान होगा। इस स्वप्न को साकार करने में हमारी राष्ट्रीय साहित्य परंपरा की बड़ी भूमिका होगी। सम्पूर्ण भारतीय साहित्य पठन-पाठन के लिए सबके आगे अनुवाद और मूल, दोनों ही रूपों में सुलभ रहेगा। 

6. साहित्य मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन से संबद्ध है। आर्थिक जीवन के अलावा मनुष्य एक प्राणी के रूप में भी जीवन बिताता है। साहित्य में उसकी बहुत-सी आटिम भावनाएँ प्रतिफलित होती हैं जो उसे प्राणिमात्र से जोड़ती हैं। इस बात को बार-बार कहने में कोई हानि नहीं है कि साहित्य विचारधारा मात्र नहीं है। उसमें मनुष्य का इन्द्रिय-बोध, उसकी भावनाएँ भी व्यंजित होती है। साहित्य का यह पक्ष अपेक्षाकृत ज्यादा स्थायी होता है-गद्यांश का आशय क्या है? 14A
उत्तर:- प्रस्तुत पाठ परम्परा का मूल्यांकन शीर्षक से लिया गया है। इसके लेखक रामविलास शर्मा है। साहित्य मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन से संबद्ध है। उसकी बहुत-सी भावनाए इसमें प्रतिफलित होती हैं जो उसे प्राणिमात्र से जोड़ती हैं। 

साहित्य में मनुष्य का इन्द्रिय-बोध, उसकी भावनाएँ व्यंजित होती हैं। साहित्य का यह पक्ष अपेक्षाकृत स्थायी होता है। लेखक का आशय यह है कि साहित्य और जीवन में घनिष्ठ संबंध है। मनुष्य की बहुत-सी आदिम भावनाएँ, उसकी भावनाएँ साहित्य में व्यंजित होती हैं जो उसे प्राणिमात्र से जोड़ती हैं।

Parampara ka mulyankan important subjective question answer परंपरा का मूल्यांकन क्या है निबंध या कहानी? परंपरा का मूल्यांकन साहित्य की कौन सी विद्या है? परंपरा का ज्ञान किन के लिए सबसे अधिक आवश्यक है और क्यों? निबंध का समापन करते हुए लेखक कैसा स्वप्न देखता है उसे साकार करने में परंपरा की क्या भूमिका हो सकती है विचार करें? parampara ka mulyankan important subjective question answer. परंपरा का मूल्यांकन | Hindi Important Subjective Questions

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